अस्थमा का निदान: अस्थमा की पहचान और डायग्नोसिस कैसे की जाती है?

Asthma Diagnosis - Manmukh Ayurveda

अस्थमा की सटीक पहचान (निदान) एक बेहतर उपचार योजना के लिए बहुत ज़रूरी है। आइए जानते हैं कि डॉक्टर अस्थमा का निदान कैसे करते हैं।

नैदानिक मूल्यांकन

डॉक्टर सबसे पहले आपके चिकित्सा इतिहास और लक्षणों के बारे में पूछेंगे:

  • लक्षण कब ज़्यादा होते हैं (जैसे रात में या व्यायाम के बाद)?
  • क्या परिवार में किसी को अस्थमा या एलर्जिक राइनाइटिस की समस्या है? (पारिवारिक इतिहास)

फेफड़ों की कार्यक्षमता की जाँचें

अस्थमा की पुष्टि के लिए पल्मोनरी फंक्शन टेस्ट (PFT) किए जाते हैं, जो यह मापते हैं कि फेफड़े कितनी अच्छी तरह काम कर रहे हैं।

1. स्पाइरोमेट्री

यह सबसे आम और सटीक जाँच है। इसमें मरीज़ को एक मशीन में ज़ोर से साँस छोड़ने के लिए कहा जाता है। यह दो मुख्य चीज़ें मापती है:

  • FVC (फोर्स्ड वाइटल कैपेसिटी): एक गहरी साँस के बाद आप कितनी हवा बाहर निकाल सकते हैं।
  • FEV1 (1 सेकंड में फोर्स्ड एक्सपाइरेटरी वॉल्यूम): आप 1 सेकंड में कितनी हवा बलपूर्वक बाहर निकाल सकते हैं। यदि FEV1 का स्तर सामान्य से कम है, तो यह श्वसन नलिकाओं में रुकावट का संकेत देता है।

2. पीक फ्लो मापन

पीक फ्लो मीटर एक छोटा उपकरण है जिसे मरीज़ घर पर भी इस्तेमाल कर सकता है। यह मापता है कि हवा कितनी तेज़ी से फेफड़ों से बाहर आ सकती है। पीक फ्लो मान में कमी अस्थमा अटैक की चेतावनी हो सकती है।

3. मेथाकोलिन चैलेंज टेस्ट

यदि स्पाइरोमेट्री के परिणाम सामान्य हैं लेकिन फिर भी अस्थमा का संदेह है, तो यह जाँच की जाती है। मेथाकोलिन एक अस्थमा ट्रिगर है। अगर इसे साँस के साथ लेने पर FEV1 में 20% से अधिक की गिरावट आती है, तो यह श्वसन नलिकाओं की अति-संवेदनशीलता और अस्थमा का संकेत है।

अन्य जाँचें

  • एलर्जी जाँच: यह जानने के लिए कि कौन से एलर्जेन अस्थमा को ट्रिगर कर रहे हैं।
  • चेस्ट एक्स-रे: फेफड़ों की अन्य बीमारियों (जैसे निमोनिया) को अलग करने के लिए।
  • FeNO जाँच (फ्रैक्शनल एग्ज़ेल्ड नाइट्रिक ऑक्साइड): साँस में नाइट्रिक ऑक्साइड की मात्रा मापती है, जो श्वसन नलिकाओं में सूजन का सूचक है।

चिकित्सीय जानकारी सूचना

चिकित्सीय अस्वीकरण: कोई भी जाँच डॉक्टर की सलाह के बिना न करें। लक्षणों की सही जाँच केवल क्लिनिकल सेटिंग में पल्मोनोलॉजिस्ट द्वारा की जानी चाहिए। प्रामाणिक स्रोत: निदान के ये मापदंड ATS (अमेरिकन थोरेसिक सोसाइटी) और ERS (यूरोपियन रेस्पिरेटरी सोसाइटी) द्वारा स्थापित किए गए हैं।

अपने पीक फ्लो मीटर की रीडिंग को समझना

पीक फ्लो मीटर एक छोटा सा उपकरण है जो यह मापता है कि आप कितनी तेज़ी से हवा बाहर निकाल सकते हैं, जो श्वसन नलिकाओं के सँकरे होने का एक अच्छा संकेतक है। डॉक्टर आमतौर पर आपकी व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रीडिंग के आधार पर तीन ज़ोन बताते हैं: ग्रीन ज़ोन (80–100% — सब सामान्य), येलो ज़ोन (50–79% — सावधानी, दवा में बदलाव की ज़रूरत हो सकती है), और रेड ज़ोन (50% से कम — तुरंत चिकित्सा सहायता ज़रूरी)। रोज़ाना पीक फ्लो दर्ज करना, खासकर मध्यम से गंभीर अस्थमा वाले लोगों के लिए, बिगड़ते लक्षणों को समय रहते पहचानने में मदद करता है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. पीक फ्लो मीटर का इस्तेमाल किसे करना चाहिए? यह खासकर मध्यम से गंभीर लगातार रहने वाले अस्थमा वाले लोगों के लिए सुझाया जाता है, ताकि रोज़ाना नियंत्रण पर नज़र रखी जा सके।

2. व्यक्तिगत सर्वश्रेष्ठ रीडिंग कैसे तय होती है? यह आमतौर पर 2–3 हफ़्तों तक, जब अस्थमा अच्छी तरह नियंत्रित हो, तब की गई सबसे अच्छी रीडिंग होती है, जिसे डॉक्टर की सलाह से दर्ज किया जाता है।

3. येलो या रेड ज़ोन में पहुँचने पर क्या करना चाहिए? अपने अस्थमा एक्शन प्लान का पालन करें, जिसमें आमतौर पर रिलीवर इनहेलर का इस्तेमाल शामिल होता है। रेड ज़ोन में तुरंत डॉक्टर या आपातकालीन सेवा से संपर्क करें।


स्रोत और आगे पढ़ें

When to seek prompt or emergency care

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